पर्यावरण पर कैसा है हमारा रिपोर्ट कार्ड !

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पर्यावरण पर कैसा है हमारा रिपोर्ट कार्ड, जानें मौजूदा कानूनों और संस्थानों में सुधार क्यों है जरूरी |

साल 2022 पर्यावरण के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष है। संयोग से, आजादी के 25 साल पूरे होने के हफ्तेभर बाद, लोकसभा ने वन्यजीव (संरक्षण) विधेयक, 1972 पारित किया, जो स्वतंत्र भारत का पहला पर्यावरण कानून था। इसके अलावा, 1972 में National Committee for Environmental Planning and Coordination (NCEPC) की भी स्थापना की गई, जिसने बाद में पर्यावरण मंत्रालय की शक्ल ली। 1972 में ही स्टॉकहोम में मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में इंदिरा गांधी ने अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था। उनके संबोधन में एक पंक्ति – गरीबी सबसे बड़ा प्रदूषक है – पर्यावरणविदों की एक पीढ़ी का मूलमंत्र बन गई और आज भी देश-विदेश में पर्यावरणीय मुद्दों पर इसकी चर्चा की जाती है। इस समय, जब हमें आजादी के अमृत महोत्सव के साथ-साथ संस्थागत पर्यावरणवाद की स्वर्ण जयंती मनानी चाहिए, तो यह देखना महत्वपूर्ण है कि हम कहां हैं और किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

हमने पर्यावरण के मोर्चे पर महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन हम काफी मुद्दों पर असफल भी रहे हैं। मैं तीन उल्लेखनीय सफलताओं और संबंधित बाधाओं का यहां जिक्र करूंगा, जो पिछले 50 वर्षों की पर्यावरणीय यात्रा को दिखाती हैं।

  • पहली सफलता यह है कि पर्यावरण संरक्षण की भावना आज ‘मुख्यधारा’ की भावना है। आज हर कोई पर्यावरण की रक्षा और जलवायु संकट को हल करने की आवश्यकता पर सहमत है। हाल ही में ऊर्जा मंत्री आर के सिंह ने संसद को बताया कि जलवायु परिवर्तन और उत्सर्जन कम करने के मुद्दे पर देश में एकमत है, जो विकसित देशों में भी नहीं है। आज राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, सभी पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के समाधान के मुद्दे पर जोर देते हैं। इसका श्रेय सभी सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को जाना चाहिए, जिन्होंने पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत की है।
  • दिक्कत यह है कि भावना और अभ्यास में बहुत बड़ा अंतर है। अभ्यास बदल रहे हैं, लेकिन काफी धीरे। इसके मुख्य कारण हैं संस्थागत बाधाएं और सामाजिक जड़ता।
  • दूसरी सफलता यह है कि हमने पर्यावरण के हर पहलू से निपटने के लिए एक व्यापक कानूनी और संस्थागत ढांचा विकसित किया है, चाहे वह वन हो, वन्य जीवन हो, प्रदूषण हो या पानी और जमीन का संरक्षण हो।
  •  यहां समस्या यह है कि हमारे कानूनों और उनके कार्यान्वयन में व्यापक अंतर है। आज देश में कानून को आसानी से तोड़ा जाता है। फैक्ट्रियां प्रदूषित पानी और गैस बिना डर के पर्यावरण में उत्सर्जित करती हैं। म्यूनिसिपैलिटी कचरे का समाधान कानून के तहत नहीं कर रही है और लोग भी अपना कानूनी दायित्व नहीं निभा रहे। इसका मुख्य कारण खराब तरीके से बनाए गए कानून और कमजोर संस्थान हैं।
  • तीसरी सफलता सबसे महत्वपूर्ण है और इस तथ्य पर गर्व भी किया जा सकता है कि हम अपने वन क्षेत्र को बढ़ाने और वन्य जीवों की रक्षा करने में काफी हद तक सफल रहे हैं। आज हमारे देश में जंगलों का क्षेत्रफल 50 साल में सबसे अधिक है। इसी तरह बाघों की संख्या भी आजादी के बाद सबसे अधिक है। असल में, आज भारत इकलौता ऐसा देश है जो बाघों को बचाने में सफल रहा है।
  • लेकिन यही चीज हम अपने शहर, गांव, कृषि क्षेत्र, नदियों और समंदर के बारे में नहीं कह सकते। वायु प्रदूषण में तो हमें विश्व का सबसे प्रदूषित देश माना जाता है। इसी तरह नदियों की भी हालत काफी खराब है। इनके तीन कारण हैं- बढ़ती आबादी, लगातार बढ़ती खपत और सिकुड़ते प्राकृतिक संसाधन। पिछले 50 वर्षों में, हमारी जनसंख्या में डेढ़ गुना (80 करोड़) और जीडीपी में 13.5 गुना वृद्धि हुई है। दूसरी ओर, हमारी प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि और मीठे पानी के संसाधन 60% तक सिकुड़ गए। हमारे उत्पादन और उपभोग प्रणालियों में मूलभूत परिवर्तन के बिना, भूमि, वायु और जल की क्षति जारी रहेगी, जिसके स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर परिणाम होंगे।

संक्षेप में कहें तो पिछले 50 वर्षों का अनुभव हमें आधे-अधूरे प्रयासों और टुकड़ों-टुकड़ों के समाधान से बचना सिखाता है। यह आज और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी चुनौतियां कहीं अधिक जटिल और अस्तित्वपरक हैं। हमें न केवल पारंपरिक मुद्दों (भूमि, जल और वायु) से निपटना है, बल्कि जलवायु संकट की चुनौती का भी सामना करना है। इस दोहरी चुनौती को हल करने के लिए पर्यावरण शासन के एक नए प्रतिमान की आवश्यकता है तो मैं इसके लिए अजेंडा प्रस्तावित करता हूं।

  • सबसे पहले हमें मौजूदा कानूनों और संस्थानों में सुधार करना चाहिए और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करना चाहिए। सभी प्रमुख पर्यावरण कानून 70 और 80 के दशक में बनाए गए थे। जलवायु संकट के आलोक में उनकी समीक्षा की जरूरत है।
  •  दूसरा, हमें जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा को और भी मजबूत करने की जरूरत है। वर्तमान में, भारत का केवल 5% ही संरक्षित है। हमें सभी इकोसिस्टम को बचाने की जरूरत है – जंगलों, घास के मैदानों, महासागरों, नदियों और रेगिस्तानों की रक्षा करके संरक्षित क्षेत्र को बढ़ाने की जरूरत है।
  •  तीसरा, हमें स्थानीय प्रशासन को मजबूत करना चाहिए और जमीनी स्तर के समाधानों को बढ़ावा देना चाहिए।
  •  चौथा, हमारे पास अक्षय ऊर्जा, सर्कुलर अर्थव्यवस्था और प्रकृति-आधारित समाधानों के आधार पर सबसे उन्नत अर्थव्यवस्था बनाने का अवसर है। इससे रोजगार सृजित होंगे, पर्यावरण की रक्षा होगी और जलवायु संकट को कम करने में मदद मिलेगी।

अंत में, हमें जमीनी स्तर पर कार्रवाई के लिए सामाजिक आंदोलनों की आवश्यकता है। इतिहास बताता है कि बड़े सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक जन आंदोलन आवश्यक होता है। हम व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामूहिक जिम्मेदारी के बिना 21वीं सदी की पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते।

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Chandra Bhushan is one of India’s foremost public policy experts and the founder-CEO of International Forum for Environment, Sustainability & Technology (iFOREST).

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