दिल्ली-NCR की तरह मुंबई में भी बिगड़े हालात… जानें क्यों वायु प्रदूषण सिर्फ हवा से जुड़ी समस्या नहीं

प्रदूषण के चलते पहले तो सिर्फ दिल्ली-एनसीआर की हालत खराब थी, लेकिन अब इसने मुंबई को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

दिल्ली-NCR में शनिवार को कई जगह AQI 450 के ऊपर चला गया, तो सीजन में पहली बार GRAP-4 लागू करना पड़ा। राजधानी के लिए बीता माह भी प्रदूषण के लिहाज से बेहद चिंताजनक रहा था। नवंबर के 24 दिनों में एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 300 के ऊपर रहा यानी बहुत खराब और 3 दिन तो यह 400 के ऊपर चला गया मतलब गंभीर। दिल्ली-NCR के साथ-साथ इस बार चिंता मुंबई ने भी बढ़ाई है। नवंबर के मुकाबले अभी हालात भले कुछ सुधरे हुए लग रहे हों, पर AQI कई जगहों पर 150 के आसपास है यानी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह।

कमजोर सुरक्षा: मुंबई की समुद्री और तटीय हवा ने लंबे समय तक शहर के आसमान को साफ बनाए रखने में मदद की, लेकिन अब यह प्राकृतिक सुरक्षा धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। पिछले कुछ वर्षों में मुंबई में धूल और सूक्ष्म कणों से होने वाला प्रदूषण बढ़ा है। कई बार AQI ‘खराब’ स्तर तक पहुंच रहा है। अब यह मानना सही नहीं रह गया कि उत्तर भारत के शहरों की तुलना में मुंबई वायु प्रदूषण से सुरक्षित है। भले ही मुंबई की हालत अभी दिल्ली जैसी गंभीर न हो, लेकिन हालात बिगड़ने के संकेत साफ दिख रहे हैं। अगर समय रहते ठोस नीतियां और सख्त प्रशासनिक कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और खराब हो सकती है।

प्रदूषण के कारण: मुंबई की हवा खराब होने के तीन बड़े कारण हैं- वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक गतिविधियां और निर्माण व तोड़फोड़ से उड़ने वाली धूल। शहर में गाड़ियों की संख्या तेजी से बढ़ी है, ट्रैफिक जाम आम हो गया है और सार्वजनिक परिवहन की लास्ट-माइल कनेक्टिविटी कमजोर है। इसके अलावा नवी मुंबई और तलोजा जैसे इलाकों में छोटे और मध्यम उद्योग भी हवा को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जहां अब भी पुरानी तकनीक और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों का इस्तेमाल होता है।

निर्माण की कीमत: मुंबई के लिए सबसे गंभीर लेकिन कम समझा गया खतरा धूल प्रदूषण है, जो बड़े निर्माण और पुनर्विकास कार्यों से पैदा हो रहा है। मेट्रो, कोस्टल रोड, ट्रांस-हार्बर लिंक और अन्य बड़ी परियोजनाओं के कारण शहर में लगातार खुदाई और निर्माण चल रहा है। निर्माण स्थलों से और कच्चा माल ढोने के दौरान भारी मात्रा में धूल हवा में उड़ती है। धूल नियंत्रण के ठोस इंतजाम न होने से PM10 स्तर तेजी से बढ़ रहा है और आसपास के इलाके प्रदूषण के हॉटस्पॉट बनते जा रहे हैं।

तालमेल की जरूरत: सर्दियों में हालात और बिगड़ जाते हैं, क्योंकि दूसरे राज्यों से आने वाला प्रदूषण भी इसमें जुड़ जाता है। मध्य प्रदेश और गुजरात में पराली जलाने से उठने वाला धुआं और धूल जब हवा के साथ मुंबई पहुंचते हैं, तो हालात बदतर हो जाते हैं। अगर राज्यों के बीच बेहतर तालमेल और साझा एयरशेड प्रबंधन नहीं हुआ, तो यह मौसमी समस्या और गंभीर होगी। धूल प्रदूषण रोकने के लिए मुंबई महानगर क्षेत्र की नगर पालिकाओं ने सड़क सफाई, पानी का छिड़काव, एंटी-स्मॉग गन और निर्माण सामग्री को ढक कर ले जाने जैसे कदम शुरू किए हैं। ये प्रयास जरूरी हैं, लेकिन इनका पालन अक्सर ढंग से और सख्ती से नहीं हो पाता।

सख्त नीति: मुंबई को तुरंत एक सख्त धूल नियंत्रण नीति की जरूरत है, जिसे सिटी बाइलॉज में शामिल किया जाए और इसकी रियल टाइम मॉनिटरिंग हो। इसके लिए नगर निगम, परिवहन, PWD, पुलिस और अन्य विभागों को मिलकर काम करना होगा। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत समिति मौजूद है, लेकिन समर्पित धूल न्यूनीकरण सेल को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

जवाबदेही का मुद्दा: वायु प्रदूषण केवल हवा से जुड़ी समस्या नहीं है, यह शासन और सार्वजनिक जवाबदेही का मुद्दा है। मुंबई को एक ऐसी मजबूत अथॉरिटी या टास्क फोर्स की जरूरत है, जो सभी विभागों को एक साथ जोड़कर काम करे। इसमें राज्य सरकार, नगर निगम, वैज्ञानिक, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नागरिक समूह शामिल हों। अभी काम कई विभागों में बंटा है, इसलिए तालमेल कमजोर रहता है और नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती।

विकास बनाम सेहत: लोगों और संस्थाओं के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए कानूनी जवाबदेही जरूरी है। दंड कठोर किए जाएं और AQI खराब होते ही निर्माण कार्य पर रोक, कचरा व पत्तियां जलाने पर प्रतिबंध और उद्योगों की कड़ी निगरानी जैसे नियम बिना ढील के लागू हों। प्रदूषण फैलाने वाले से ही कीमत वसूली जाए। सवाल विकास बनाम साफ हवा का नहीं, बल्कि ऐसे विकास का है जो लोगों की सेहत को नुकसान न पहुंचाए। सही योजना, कड़ाई से अमल और तकनीक के जरिये जल्दी सुधार संभव है। साफ हवा का मतलब है स्वस्थ लोग, इलाज का कम खर्च और रहने के लिए बेहतर शहर।

 

 

पर्यावरण रक्षा में धर्म की क्या भूमिका हो

कुंभ सदियों से आध्यात्मिक खोज, एकता और नवजागरण का प्रतीक रहा है। इस बार प्रयागराज में इस प्राचीन परंपरा को नई दिशा दे रही है। प्रयागराज में ‘धर्म, आस्था और जलवायु परिवर्तन’ पर एक सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इस सम्मेलन का उद्देश्य पवित्रता और सतत विकास के बीच पुल बनाना है। विशेष रूप से जलवायु संकट के संदर्भ में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।

धर्म की शक्ति

कुंभ सम्मेलन एक सार्वभौमिक सत्य को स्वीकारता है कि जलवायु परिवर्तन पर काबू तभी पाया जा सकता है जब हम सांस्कृतिक मूल्यों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। विज्ञान जलवायु संकट की चेतावनी दे सकता है, लेकिन धर्म उन मूल्यों की पहचान कर सकता है जो इस संकट से निपटने के लिए जरूरी हैं। धर्म के पास वह सांस्कृतिक ऊर्जा और प्रभावी स्वर है जो लोगों तक पहुंच सकता है।

आध्यात्मिक दायित्व

धार्मिक ग्रंथों में पर्यावरण संरक्षण को आध्यात्मिक दायित्व के रूप में देखा गया है। उदाहरण के लिए, हिन्दू धर्म में प्रकृति संरक्षण मानव का कर्तव्य बताया गया है। अथर्ववेद में पृथ्वी को मां के रूप में सम्मानित किया गया है। इसी तरह, इस्लाम में जल-जीव-जंतु, पेड़-पौधों, सभी में ईश्वर की रूह के दर्शन का उल्लेख किया गया है और बौद्ध एवं जैन धर्म में अहिंसा का सिद्धांत सभी जीवों के प्रति दयालुता और पारिस्थितिक संतुलन की शिक्षा देता है। ये धार्मिक मूल्य पर्यावरण संरक्षण को एक मजबूत नैतिक आधार प्रदान करते हैं।

प्रयोजन में पर्यावरण

कल्पना कीजिए, यदि हर प्रयोजन में पर्यावरण-संरक्षण की भावना हो, तो प्लास्टिक के बजाय मिट्टी, जल, प्राकृतिक रंगों और पत्तों का उपयोग किया जाए, तो न केवल उत्सवों का हिस्सा बन पाएंगे बल्कि जीवन को भी सच्चे अर्थों में उत्सवमय बना सकेंगे। धार्मिक आयोजन समाज को प्रेरित कर सकते हैं। हरित तीर्थयात्राएं, हरित त्योहार, और स्थायी मंदिर प्रबंधन जैसे प्रयास धार्मिक आयोजनों के होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को कम कर सकते हैं।

सामाजिक सह-श्रवण

धार्मिक समुदाय मानवीय और सामाजिक सह-श्रवण को बढ़ावा देते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली पलायन और जीवन-यापन की स्थितियों का सामना करने में धर्म की शिक्षाएं सहायक सिद्ध हो सकती हैं। संकट के समय धार्मिक संस्थाएं उन संकटों से निपटने के लिए व्यवहारिक समाधान और भावनात्मक समर्थन दोनों प्रदान कर सकती हैं।

हरित धार्मिक स्थल

इस सम्मेलन का मुख्य आकर्षण उत्तर भारत के प्रमुख हरित धार्मिक स्थलों की पहल है। हरित धार्मिक स्थलों को जल, ऊर्जा, कचरा प्रबंधन, और सतत विकास के मॉडल में बदलने के लिए प्रतिबद्ध संस्थाएं शामिल हैं। सारे प्रमुख तीर्थों में, वार्षिक उत्सवों के दौरान प्लास्टिक, रंगों और फूलों के उपयोग को सीमित करना, लोहे और सिंथेटिक पदार्थों के बजाय पर्यावरण अनुकूल वस्तुओं का प्रयोग करना, और पवित्र स्थलों के आसपास हरित क्षेत्र विकसित करना इसके उद्देश्य हैं।

बदलाव का केंद्र

उत्तर भारत का धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश स्वयं एक बड़ा प्रेरक बन सकता है। जब धर्म और पर्यावरण का संगम होता है, तो यह संकेत मिलता है कि प्रकृति की रक्षा एक आध्यात्मिक कार्य भी है। इसे हम फिर से उसी शक्ति में बदल सकते हैं जो जलवायु संकट से निपटने के लिए आवश्यक है। इस मंच के माध्यम से धर्म समाज को सकारात्मक और शक्तिशाली प्रेरणा दे सकता है।

बाकू में क्यों नहीं बन पाई बात, भारत ने लगाया हेरफेर का आरोप

अजरबैजान के बाकू में हालिया संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP 29) में जो जलवायु वित्तपोषण समझौता हुआ, उससे इतिहास की एक बड़ी प्रसिद्ध बात याद आती है। 1942 में महात्मा गांधी ने क्रिप्स मिशन की आलोचना करते हुए इसके प्रस्ताव को डूबते हुए किसी बैंक में आया ‘एक आने का चेक’ बताया था। दोनों बातों में बस एक फर्क है- महात्मा गांधी ने इस मिशन के प्रस्ताव को एक आने का चेक कहकर रिजेक्ट कर दिया था, जबकि आलोचना के बावजूद कॉप के वित्तपोषण समझौते को भारत सहित कई देशों ने अपना लिया है। यह मंजूरी बताती है कि जलवायु संकट दूर करने में संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) सहित बाकी दुनिया ने जो कोशिशें की हैं, वे बड़े लेवल पर फेल हो गई हैं।

नहीं मानी मांग

बाकू सम्मेलन में विकासशील देशों ने 2030 तक क्लाइमेट इमरजेंसी से निपटने के लिए विकसित देशों से सालाना 1.3 ट्रिलियन डॉलर मांगे थे। प्रस्ताव में कम से कम 500 बिलियन डॉलर की सरकारी रकम शामिल थी, बाकी प्राइवेट सेक्टर से रियायती दरों पर दिए जाने की मांग थी। दो हफ्तों की विवादास्पद बातचीत के बाद अंतिम समझौते में विकसित देशों ने 2035 तक केवल 300 बिलियन डॉलर सालाना देने की बात कही। इसमें सरकारी पैसे का कोई जिक्र नहीं है, बल्कि यह लिखा है कि यह किसी भी स्रोत से आ सकता है।

धुंधला वादा

पैसे जुटाने के स्रोतों के मामले में यह समझौता बेहद धुंधला वादा करता है। इससे भी खराब बात यह है कि यह समझौता विकसित देशों को विश्व बैंक जैसे मल्टिलैटरल डिवेलपमेंट बैंकों से जलवायु संबंधी कर्ज को मनी पूल के हिस्से के रूप में शामिल करने की अनुमति देता है। यानी विकसित देशों पर 2035 तक वर्तमान 100 बिलियन डॉलर सालाना से ज्यादा धनराशि देने का कोई दायित्व नहीं है।

क्या करेंगे ट्रंप 

इस समझौते का राजनीतिक भविष्य भी अनिश्चित है, क्योंकि इस बात की बहुत कम संभावना है कि बाइडन प्रशासन ने जलवायु को लेकर जो भी प्रतिबद्धताएं की हैं, उनका ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन भी सम्मान करेगा। लब्बोलुआब यह है कि बाकू समझौता बताता है कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन के समाधान से अपना हाथ झाड़ना चाहते हैं और जलवायु संकट की बढ़ती लागतों का सारा बोझ विकासशील देशों पर थोपना चाहते हैं।

गलत उम्मीद

वैसे, इन सब चीजों से बहुत ताज्जुब नहीं होना चाहिए। 2009 में विकसित देशों ने 2020 तक क्लाइमेट फाइनेंस में सालाना 100 अरब डॉलर देने का वादा किया था, मगर पूरा किया 2022 तक। इसमें भी लगभग 70% हिस्सा मार्केट की महंगी दरों पर दिया कर्ज था। इससे विकासशील राष्ट्रों पर कर्ज का बोझ और भी बढ़ गया। उन देशों से खरबों डॉलर की उम्मीद करना हमेशा से ही अवास्तविक था, जो अरबों डॉलर देने में ही आनाकानी कर रहे थे। अब विकासशील देशों को क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर नए उपाय करने होंगे।

कमजोरों से वसूली

अब वैश्विक वित्तीय प्रणाली में मौलिक सुधारों की जरूरत है ताकि विकासशील देश जलवायु संकट से निपटने के काबिल बन सकें और सभी देशों को ठीक से सहयोग देने के लायक बनाने के लिए UNFCCC में सुधार किया जा सके। आज की वैश्विक वित्तीय प्रणाली कमजोर देशों के खिलाफ है। उदाहरण के लिए, गरीब अफ्रीकी देश कर्ज पर जिन ब्याज दरों का भुगतान करते हैं वे अमेरिका द्वारा भुगतान की जाने वाली दरों से चार गुना अधिक और धनी यूरोपीय देशों द्वारा भुगतान की जाने वाली दरों से आठ गुना अधिक हैं।

बढ़ता बोझ

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट बताती है कि जलवायु संबंधी चुनौतियों ने पहले ही 25 कमजोर विकासशील देशों को मिलने वाला कर्ज महंगा कर रखा है। इन देशों को सिर्फ सरकारी कर्ज पर 10 वर्षों में अतिरिक्त 40 बिलियन डॉलर के ब्याज का भुगतान करना होता है। इसका मतलब है कि विकासशील देश आज के जलवायु जोखिमों के चलते धनी देशों और उनके बैंकों को करोड़ों डॉलर अलग से दे रहे हैं। यह बोझ अगले दशक में दोगुना हो जाएगा। यानी इन देशों पर जलवायु संबंधी चुनौतियों का फायदा उठाया जा रहा है।

ठंडा पड़ा अजेंडा 

इस अन्याय को दूर करने के लिए भारत ने अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान कई बेहतरीन प्रस्ताव दिए थे। इसके अलावा वर्षों से कई और प्रस्ताव वैश्विक संस्थानों के अजेंडे में हैं। ये सुधार लागू होंगे, तभी विकासशील देशों की विकसित देशों पर असंगत, अन्यापूर्ण और अपर्याप्त धन की निर्भरता कम होगी और वे अपने संसाधनों का उपयोग करके राहत पा सकेंगे।

भारत का आरोप 

वैसे, UNFCCC के भीतर भी सुधार जरूरी हैं। बाकू में भारत ने COP अध्यक्षता और UNFCCC सचिवालय पर वित्त समझौते को अपनाने में होने वाली प्रक्रिया में हेरफेर करने का आरोप लगाया, जो संस्थान में गहरे अविश्वास को दर्शाता है। इसके अलावा UNFCCC की कार्यवाही में फॉसिल फ्यूल बिजनेस के बढ़ते प्रभाव से इसकी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता को खतरा है। सचाई यह है कि UNFCCC अब केवल जानकारी जुटाने, उनका हिसाब करके आगे बढ़ाने का ही मंच रह गया है।

कई फ्रेमवर्क बने

अब ऐसे में किया क्या जाए? एक तो UNFCCC को छोटी-छोटी ऐसी मीटिंगों में बदला जाए, जहां समाधान निकले और जहां देश अपने वादों के लिए जवाबदेह हों। किसी सिंगल ग्लोबल फ्रेमवर्क पर निर्भर रहने की जगह अगर वाकई बदलाव लाना है तो ऊर्जा, परिवहन, कृषि, उद्योग वगैरह पर कई वैश्विक और क्षेत्रीय मंच बनाने होंगे।

ब्राजील पर दारोमदार

बाकू सम्मेलन ने इंटरनैशनल क्लाइमेट फ्रेमवर्क कमजोरियां तो दिखाई ही हैं, यह भी उजागर किया है कि इसे लेकर देशों के बीच कितना गहरा अविश्वास है। अब सारा दारोमदार COP30 के मेजबान ब्राजील पर है कि वह भरोसा बहाल करते हुए सार्थक प्रगति करे। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जो लड़ाई चल रही है, वह ठोस सुधारों के बगैर पूरी नहीं होनी है, अलबत्ता निष्क्रिय होने का उस पर जोखिम जरूर है।

दुनिया में सहयोग बढ़ाने की पहल

G20 के शीर्ष पर भारत का कार्यकाल एक परिवर्तन एजेंडे के लिए याद किया जायगा जो यथास्थिति को चुनौती देता है और वैश्विक सहयोग की पुनरकल्पना करता है

पर्यावरण पर कैसा है हमारा रिपोर्ट कार्ड !

पर्यावरण पर कैसा है हमारा रिपोर्ट कार्ड, जानें मौजूदा कानूनों और संस्थानों में सुधार क्यों है जरूरी |

साल 2022 पर्यावरण के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष है। संयोग से, आजादी के 25 साल पूरे होने के हफ्तेभर बाद, लोकसभा ने वन्यजीव (संरक्षण) विधेयक, 1972 पारित किया, जो स्वतंत्र भारत का पहला पर्यावरण कानून था। इसके अलावा, 1972 में National Committee for Environmental Planning and Coordination (NCEPC) की भी स्थापना की गई, जिसने बाद में पर्यावरण मंत्रालय की शक्ल ली। 1972 में ही स्टॉकहोम में मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में इंदिरा गांधी ने अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था। उनके संबोधन में एक पंक्ति – गरीबी सबसे बड़ा प्रदूषक है – पर्यावरणविदों की एक पीढ़ी का मूलमंत्र बन गई और आज भी देश-विदेश में पर्यावरणीय मुद्दों पर इसकी चर्चा की जाती है। इस समय, जब हमें आजादी के अमृत महोत्सव के साथ-साथ संस्थागत पर्यावरणवाद की स्वर्ण जयंती मनानी चाहिए, तो यह देखना महत्वपूर्ण है कि हम कहां हैं और किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

हमने पर्यावरण के मोर्चे पर महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन हम काफी मुद्दों पर असफल भी रहे हैं। मैं तीन उल्लेखनीय सफलताओं और संबंधित बाधाओं का यहां जिक्र करूंगा, जो पिछले 50 वर्षों की पर्यावरणीय यात्रा को दिखाती हैं।

  • पहली सफलता यह है कि पर्यावरण संरक्षण की भावना आज ‘मुख्यधारा’ की भावना है। आज हर कोई पर्यावरण की रक्षा और जलवायु संकट को हल करने की आवश्यकता पर सहमत है। हाल ही में ऊर्जा मंत्री आर के सिंह ने संसद को बताया कि जलवायु परिवर्तन और उत्सर्जन कम करने के मुद्दे पर देश में एकमत है, जो विकसित देशों में भी नहीं है। आज राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, सभी पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के समाधान के मुद्दे पर जोर देते हैं। इसका श्रेय सभी सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को जाना चाहिए, जिन्होंने पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत की है।
  • दिक्कत यह है कि भावना और अभ्यास में बहुत बड़ा अंतर है। अभ्यास बदल रहे हैं, लेकिन काफी धीरे। इसके मुख्य कारण हैं संस्थागत बाधाएं और सामाजिक जड़ता।
  • दूसरी सफलता यह है कि हमने पर्यावरण के हर पहलू से निपटने के लिए एक व्यापक कानूनी और संस्थागत ढांचा विकसित किया है, चाहे वह वन हो, वन्य जीवन हो, प्रदूषण हो या पानी और जमीन का संरक्षण हो।
  •  यहां समस्या यह है कि हमारे कानूनों और उनके कार्यान्वयन में व्यापक अंतर है। आज देश में कानून को आसानी से तोड़ा जाता है। फैक्ट्रियां प्रदूषित पानी और गैस बिना डर के पर्यावरण में उत्सर्जित करती हैं। म्यूनिसिपैलिटी कचरे का समाधान कानून के तहत नहीं कर रही है और लोग भी अपना कानूनी दायित्व नहीं निभा रहे। इसका मुख्य कारण खराब तरीके से बनाए गए कानून और कमजोर संस्थान हैं।
  • तीसरी सफलता सबसे महत्वपूर्ण है और इस तथ्य पर गर्व भी किया जा सकता है कि हम अपने वन क्षेत्र को बढ़ाने और वन्य जीवों की रक्षा करने में काफी हद तक सफल रहे हैं। आज हमारे देश में जंगलों का क्षेत्रफल 50 साल में सबसे अधिक है। इसी तरह बाघों की संख्या भी आजादी के बाद सबसे अधिक है। असल में, आज भारत इकलौता ऐसा देश है जो बाघों को बचाने में सफल रहा है।
  • लेकिन यही चीज हम अपने शहर, गांव, कृषि क्षेत्र, नदियों और समंदर के बारे में नहीं कह सकते। वायु प्रदूषण में तो हमें विश्व का सबसे प्रदूषित देश माना जाता है। इसी तरह नदियों की भी हालत काफी खराब है। इनके तीन कारण हैं- बढ़ती आबादी, लगातार बढ़ती खपत और सिकुड़ते प्राकृतिक संसाधन। पिछले 50 वर्षों में, हमारी जनसंख्या में डेढ़ गुना (80 करोड़) और जीडीपी में 13.5 गुना वृद्धि हुई है। दूसरी ओर, हमारी प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि और मीठे पानी के संसाधन 60% तक सिकुड़ गए। हमारे उत्पादन और उपभोग प्रणालियों में मूलभूत परिवर्तन के बिना, भूमि, वायु और जल की क्षति जारी रहेगी, जिसके स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर परिणाम होंगे।

संक्षेप में कहें तो पिछले 50 वर्षों का अनुभव हमें आधे-अधूरे प्रयासों और टुकड़ों-टुकड़ों के समाधान से बचना सिखाता है। यह आज और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी चुनौतियां कहीं अधिक जटिल और अस्तित्वपरक हैं। हमें न केवल पारंपरिक मुद्दों (भूमि, जल और वायु) से निपटना है, बल्कि जलवायु संकट की चुनौती का भी सामना करना है। इस दोहरी चुनौती को हल करने के लिए पर्यावरण शासन के एक नए प्रतिमान की आवश्यकता है तो मैं इसके लिए अजेंडा प्रस्तावित करता हूं।

  • सबसे पहले हमें मौजूदा कानूनों और संस्थानों में सुधार करना चाहिए और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करना चाहिए। सभी प्रमुख पर्यावरण कानून 70 और 80 के दशक में बनाए गए थे। जलवायु संकट के आलोक में उनकी समीक्षा की जरूरत है।
  •  दूसरा, हमें जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा को और भी मजबूत करने की जरूरत है। वर्तमान में, भारत का केवल 5% ही संरक्षित है। हमें सभी इकोसिस्टम को बचाने की जरूरत है – जंगलों, घास के मैदानों, महासागरों, नदियों और रेगिस्तानों की रक्षा करके संरक्षित क्षेत्र को बढ़ाने की जरूरत है।
  •  तीसरा, हमें स्थानीय प्रशासन को मजबूत करना चाहिए और जमीनी स्तर के समाधानों को बढ़ावा देना चाहिए।
  •  चौथा, हमारे पास अक्षय ऊर्जा, सर्कुलर अर्थव्यवस्था और प्रकृति-आधारित समाधानों के आधार पर सबसे उन्नत अर्थव्यवस्था बनाने का अवसर है। इससे रोजगार सृजित होंगे, पर्यावरण की रक्षा होगी और जलवायु संकट को कम करने में मदद मिलेगी।

अंत में, हमें जमीनी स्तर पर कार्रवाई के लिए सामाजिक आंदोलनों की आवश्यकता है। इतिहास बताता है कि बड़े सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक जन आंदोलन आवश्यक होता है। हम व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामूहिक जिम्मेदारी के बिना 21वीं सदी की पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते।

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