मोदी ने पर्यावरण संरक्षण को भारतीय मूल्यों से जोड़ा

नरेंद्र मोदी अब लगातार सबसे लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए हैं। इस मौके पर एक स्वाभाविक सवाल उठता है — आखिर पीएम मोदी का पर्यावरण-दर्शन क्या है? यह सवाल तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम उन्हें स्वच्छता, जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर लगातार बोलते सुनते हैं। शायद वे पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लाल किले की प्राचीर से बार-बार पर्यावरण को बेहतर बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।

स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत

2014 में अपने पहले कार्यकाल में, पहले स्वतंत्रता दिवस भाषण में ही मोदी ने स्वच्छता और खुले में शौच को खत्म करने पर बल दिया था। स्वच्छ भारत मिशन को उन्होंने सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दिया। शुरुआती सालों में साफ-सफाई, पानी की किल्लत और मिट्टी की गुणवत्ता जैसे स्थानीय मुद्दों पर फोकस रहा।

2015 में घरेलू वायु प्रदूषण और साफ रसोई ईंधन का मुद्दा उठा, जो 2016 में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के रूप में सामने आया। इसके साथ ही ‘पानी बचाओ, ऊर्जा बचाओ, खाद बचाओ’ का नारा देते हुए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना भी शुरू की गई। बाद के वर्षों में एकल-उपयोग प्लास्टिक के खिलाफ अभियान चलाया गया, जिसे कानूनी रूप भी दिया गया।

पिछले कुछ वर्षों में मोदी जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा और टिकाऊ उपभोग जैसे वैश्विक मुद्दों पर अधिक सक्रिय नजर आए हैं। 2020 के बाद से उनके भाषणों में ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन की चर्चा प्रमुखता से होने लगी। हालांकि इसकी जड़ें पुरानी हैं — 2009 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने देश का पहला जलवायु परिवर्तन विभाग बनाया था और सौर ऊर्जा के शुरुआती समर्थकों में से रहे।

चार सूत्रों पर टिका पर्यावरण नजरिया

मोदी की पर्यावरण संबंधी सोच के पीछे चार प्रमुख सूत्र दिखते हैं:

पहला — जन-भागीदारी: सरकारी योजना से ज्यादा यह जनता की भागीदारी से बदलाव लाने पर जोर देता है। रसोई गैस सब्सिडी छोड़ने का गिव-इट-अप अभियान इसी का उदाहरण है। स्वच्छ भारत की कामयाबी का श्रेय भी टीम इंडिया और जन-भागीदारी को दिया जाता है।

दूसरा — सह-लाभ की अवधारणा: ऐसे काम जो अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, जन-स्वास्थ्य को एक साथ फायदा पहुंचाएं। स्वच्छता, जल संरक्षण, रसोई गैस और बिजली पहुंचाने वाली योजनाओं से पर्यावरणीय सुधार के साथ लोगों का जीवन स्तर और स्वास्थ्य भी बेहतर हुआ है। हरित ऊर्जा की महत्वाकांक्षा के पीछे भी यही भरोसा है कि यह भविष्य के विकास और नौकरियों का जरिया बनेगी।

तीसरा — महिला-केंद्रित दृष्टिकोण: जल जीवन मिशन, उज्ज्वला योजना और स्वच्छ भारत अभियान जैसी पहलों में महिलाओं की सेहत, सुरक्षा, गरिमा और सुविधा को खास तौर पर ध्यान में रखा गया है।

चौथा — परंपरा और आधुनिक विज्ञान का मेल: पंच तत्व और हरित हाइड्रोजन की बात एक साथ करना इसी सोच की मिसाल है। संयुक्त राष्ट्र संघ की जलवायु वार्ताओं में भी उनकी पहल — पर्यावरण के लिए जीवनशैली, और भारत की संयमित उपभोग की परंपरा से जुड़ी रही है।

पंडित उपाध्याय के विचारों से जुड़ाव

इन चार सूत्रों को समझने के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को समझना जरूरी है। इस विचारधारा में विकास का केंद्र मनुष्य होता है, और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने पर जोर रहता है। बेलगाम उपभोगवाद को इस सोच में भारतीय सभ्यता से बाहर का माना गया है। 1965 में बंबई में दिए गए अपने व्याख्यानों में पंडित उपाध्याय ने प्रकृति की रक्षा, टिकाऊ खेती और भारत के पारंपरिक ज्ञान को निखारते हुए आधुनिक विज्ञान अपनाने की बात कही थी।

विचार से जन-आंदोलन तक

मोदी के पर्यावरणवाद को एकात्म मानववाद का व्यावहारिक रूप कहना गलत नहीं होगा। उन्होंने पंडित उपाध्याय के विचारों को नया आयाम देकर इन्हें नीति, कार्यक्रमों और जन-आंदोलन में बदल दिया है। इस तरह उन्होंने भारत के पारंपरिक पर्यावरण एजेंडे को एक ऐसी पहचान दी है जो परंपरा और आधुनिकता के संगम पर खड़ी है — जन-भागीदारी, महिलाओं की गरिमा, जन-स्वास्थ्य, ऊर्जा सुरक्षा और आधुनिक तकनीक, सभी इसमें शामिल हैं।

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