किसानों के लिए मुश्किल घड़ी, भूराजनीति और जलवायु परिवर्तन का सामना कर रहे हैं भारतीय किसान; ईरान जंग भी अहम वजह

भारत का कृषि क्षेत्र इस साल भू-राजनीति और जलवायु परिवर्तन के दोहरे संकट से जूझ रहा है। LNG आपूर्ति प्रभावित होने से यूरिया महंगा हो रहा है, जिससे सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। वहीं, एल-नीनो से मॉनसून और तापमान पर असर पड़ेगा।

भारत के किसान हमेशा अनिश्चितताओं के बीच खेती करते आए हैं। बाढ़, सुखाड़, कीट और कीमतों में गिरावट आम बात है। मगर, इस साल हालात जुदा हैं। भू-राजनीति और जलवायु परिवर्तन जैसे दो बड़े संकट खेती के खरीफ सीजन को प्रभावित कर रहे हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास बढ़ते तनाव से उर्वरक और डीजल आपूर्ति पर असर पड़ रहा है, तो जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव और असामान्य मॉनसून का भी खतरा है। इससे खरीफ फसलों पर बुरा असर पड़ने की आशंका है।

यूरिया पर असर : अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो कृषि क्षेत्र के लिए भविष्य के बड़े संकट की झलक है। भारत में यूरिया सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाला उर्वरक है। इसकी करीब 90% आपूर्ति आयात या आयातित गैस पर निर्भर है। अमेरिका-ईरान संघर्ष से लिक्विफाइड नैचुरल गैस (LNG) की आपूर्ति अनिश्चित हो गई है। इससे देश में यूरिया उत्पादन घटा है। नतीजतन, कीमतें साल भर में 500 से बढ़कर 1,000 डॉलर प्रति टन हो गई हैं।

सब्सिडी का बोझ: सरकार सब्सिडी के जरिये यूरिया की कीमत नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। लेकिन, इससे वित्तीय बोझ बढ़ रहा है। इस साल यूरिया सब्सिडी बिल करीब 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं अब भी बरकरार हैं। होर्मुज स्ट्रेट अब भारत की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करने लगा है। यह संघर्ष लंबा चलता है, तो ईंधन, उर्वरक और खेती की लागत इतनी बढ़ जाएगी कि सब्सिडी से इसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।

एल-नीनो इफेक्ट: देश की खेती-किसानी पर दूसरा बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल एल-नीनो बहुत ज्यादा ताकतवर हो सकता है। यानी मौसम सामान्य से ज्यादा बदल सकता है। भारत में पहले से ही अत्यधिक गर्मी पड़ रही है। दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में अधिकतर भारत के ही हैं। ऐसे में सुपर एल-नीनो तापमान को सामान्य से काफी अधिक बढ़ा सकता है और इससे मॉनसून के प्रभावित होने का खतरा है।

स्थायी समस्या: भारत में लगभग आधी खेती बारिश पर ही निर्भर है। इसलिए मॉनसून का समय और मात्रा बहुत अहम है। एल-नीनो जैसे असर जोखिम को और बढ़ा देते हैं। इसके खत्म होने के बाद भी प्रभाव रहता है। जैसे- मिट्टी की नमी कम हो जाती है, भूजल नहीं भरता और बुआई देर से शुरू हो पाती है। इससे किसान लंबे समय तक परेशान रहते हैं। सरकार को अब यह समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन कोई अस्थायी समस्या नहीं, दिनों-दिन बढ़ती चुनौती बन रही है। आज एल-नीनो है, कल हीटवेव जैसी समस्याएं लगी रहती हैं, जिससे खेती, रोजगार और अर्थव्यवस्था के प्रभावित होने का खतरा है।

आत्मनिर्भरता जरूरी: इस संकट का समाधान भी संभव है। देश के पास तकनीक है, बस इन्हें बड़े पैमाने पर लागू करने की जरूरत है। सबसे पहले हमें ऊर्जा और उर्वरक में आत्मनिर्भर बनना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा से ग्रीन हाइड्रोजन बनाकर आयातित गैस पर निर्भरता घटाई जा सकती है। सोलर पंप, इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर और सोलर या बायोमास से चलने वाली कोल्ड चेन से खेती सुरक्षित हो सकती है। ये चीजें पहले से उपलब्ध हैं और इनका उपयोग भी हो रहा है। जरूरत है सही नीतियों और पर्याप्त निवेश की, ताकि इन्हें बड़े पैमाने पर अपनाया जा सके।

अलग रणनीति: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत को विभिन्न क्षेत्रों के हिसाब से खेती की योजना बनानी होगी। ऐसी फसलें उगाना शामिल है, जो तपती गर्मी और अनियमित बारिश झेल सके। इसके अलावा, पानी का बेहतर प्रबंधन और सिंचाई की सटीक व्यवस्था अपनानी होगी। अब किसानों को भी एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय कई फसलें उगानी चाहिए। केमिकल का कम इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसा हो भी रहा है। आंध्र प्रदेश के करीब 8 लाख किसानों ने प्राकृतिक खेती अपना ली है, जिससे लागत कम हुई। कई किसानों ने सोलर पंप लगवा लिया है। अब बस उन्हें मजबूत समर्थन की दरकार है।

पूरा बदलाव जरूरी: भू-राजनीति और जलवायु परिवर्तन, दोनों का दबाव बढ़ रहा है। इसलिए तेज और समन्वित नीति बनानी जरूरी है। इसके लिए हरित उर्वरक, खेती में बिजली का उपयोग, प्राकृतिक खेती, मजबूत फसल बीमा और जलवायु आधारित खेती को बढ़ावा देना होगा। अब अलग-अलग संकट से निपटना नाकाफी है। किसानों को सुरक्षित रखने के लिए पूरी कृषि व्यवस्था में बदलाव करना होगा, तब ही वे बदलते मौसम में अपनी आजीविका संभाल पाएंगे।

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