सब्सिडी बोझ और आयात निर्भरता के बीच हरित यूरिया का उभरता विकल्प

पश्चिम एशिया संघर्ष ने भारत की ऊर्जा निर्भरता को सबके सामने ला दिया है। लेकिन इसका एक और पहलू है जिस पर कम बात होती है — यह हमारी खाद्य सुरक्षा की भी कमर तोड़ता है। हरित कृषि के बारे में भारत फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए यूरिया पर निर्भर रहा है।

यूरिया कुल उपयोग की होने वाले उर्वरकों का 56 प्रतिशत और सभी नाइट्रोजन उर्वरकों का लगभग 80 प्रतिशत है। देश में बनाने वाले 80 प्रतिशत से अधिक यूरिया के लिए आयातित प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल होता है और कुल खपत का पांचवें हिस्से से अधिक सीधे आयात किया जाता है। कुल मिलाकर भारत में इस्तेमाल होने वाला लगभग 90 प्रतिशत यूरिया किसी न किसी रूप में आयात पर निर्भर है।

इसका वित्तीय बोझ भी बहुत भारी है। यूरिया पर सब्सिडी 1980-81 में 500 करोड़ रुपए से कम थी जो 2022-23 में बढ़कर 1.65 लाख करोड़ रुपए हो गई है। यानी हम एक ऐसी व्यवस्था के बनाए रखने के लिए देश का अरबों रुपया खर्च कर रहे हैं, जो पूरी तरह बाहरी निर्भरता पर टिकी है। जरूरी बात यह है कि इसका विकल्प बनाने के लिए जरूरी तकनीक और सरकारी कार्यक्रम पहले से मौजूद हैं। बस जरूरत है एक ऐसे मिशन की जो इन सबको एक साथ जोड़ सके।

यूरिया बनाने में दो मुख्य प्रक्रियाएं होती हैं — पहले हाइड्रोजन और नाइट्रोजन से अमोनिया बनाना और फिर उसे कार्बन डाई ऑक्साइड के साथ मिलाना। भारतीय कारखाने हाइड्रोजन और कार्बन डाई ऑक्साइड के लिए प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करते हैं, जबकि हाइड्रोजन हवा से ली जाती है। इस तरह बनाई गई यूरिया को ‘ग्रे यूरिया’ कहते हैं। लेकिन हाइड्रोजन को पानी से भी बनाया जा सकता है — इस प्रक्रिया को ‘इलेक्ट्रोलिसिस’ कहते हैं।

1970 के दशक में फर्टिलाइजर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के नंगल कारखाने में इसी तरह हाइड्रोजन बनाई जाती थी, फिर भाखड़ा बिजली की कमी के कारण इसे बंद करके प्राकृतिक गैस अपनाना पड़ा। इसके अलावा कार्बन कैप्चर और उपयोग यानी सीसीयू तकनीक भी यूरिया उद्योग में पहले से इस्तेमाल होती है, जिसमें धुएं से कार्बन डाई ऑक्साइड निकाली जाती है।

यानी हमारे पास पहले से ही वो सभी तकनीकें हैं, जिनसे बिजली का इस्तेमाल करके यूरिया बनाई जा सकती है। इलेक्ट्रोलिसिस से हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर से कार्बन डाई ऑक्साइड और हवा से नाइट्रोजन! अगर यह बिजली नवीकरणीय ऊर्जा से आए तो यह बन जाती है ‘हरित यूरिया’

सबसे बड़ा सवाल लागत का है। एक अध्ययन से पता चलता है कि हरित यूरिया 2028 तक किसी कारखाने के लिए सबसे सस्ता विकल्प बन सकती है। 2030 तक इसकी लागत में यूरिया से 20 प्रतिशत कम होने का अनुमान है और 2050 तक यह फर्क लगभग 100 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।

2025 से 2050 के बीच हरित यूरिया की औसत लागत करीब 475 डॉलर प्रति टन होगी, जबकि ये यूरिया के लिए यह 540 डॉलर है। आज वैश्विक बाजार में ये यूरिया 600 डॉलर प्रति टन तक पहुंच रही है। अनिश्चित भू-राजनीति के इस दौर में आर्थिक रूप से हरित यूरिया के पक्ष में जा रहा है।

भारत के पास इस बदलाव को गति देने के लिए कार्यक्रम तो हैं लेकिन इन्हें नई दिशा देने की जरूरत है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य हरित यूरिया की ओर मोड़ना होगा। केंद्रीय बजट में कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण के लिए पांच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इस कार्यक्रम में यूरिया कारखानों को कार्बन डाई ऑक्साइड की आपूर्ति को प्राथमिकता देनी चाहिए।

अगर हम इन सभी कार्यक्रमों को एक साथ लाएं और इन्हें एक नई दिशा दें तो यूरिया उद्योग को हरित बनाया जा सकता है।

साथ ही, यूरिया की खपत को भी कम करना होगा। इसके लिए सरकार को हरित यूरिया मिशन शुरू करना चाहिए जो तीन काम करे — यूरिया उत्पादन को प्राकृतिक गैस से हरित हाइड्रोजन पर लाना, खपत को कम और बेहतर बनाना और उर्वरकों के मिश्रण को संतुलित करना।

अगर 2040 तक 90 प्रतिशत उत्पादन हरित हाइड्रोजन पर आ जाए, तो गैर-नाइट्रोजनी खेती बढ़े और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता सुधरे, तो बड़े फायदे हो सकते हैं। यह आयात बंद होगा, सब्सिडी कम होगी और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी कमी आएगी। हालांकि यह संभावना आसान नहीं होगी।

यूरिया उद्योग पर सरकारी नियंत्रण अधिक है, जिससे बाजार की गति धीमी है। इस धीरे-धीरे बाजार में इस विकल्पों के लिए खिड़की खुलनी जरूरी होगी। यूरिया को नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है।

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